किसान आंदोलन में किसानों के मास्क ना पहनने और शारीरिक दूरी का अनुपालन ना किए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। कोरोना गाइडलाइन को लेकर SC ने कहा- हो सकते हैं तबलीगी जमात जैसे हालात ।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट  ने 7 जनवरी को नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों और अन्य लोगों द्वारा कोविड-19 (Covid-19) को लेकर जारी गाइडलाइन फॉलो नहीं करने पर चिंता जताई। बता दें कि किसानों का प्रदर्शन (Farmers Protest) पिछले 44 दिनों से जारी है और किसान लगातार कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। 7 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर मार्च निकाला गया।

सुप्रीम कोर्ट  ने एक केस की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से सवाल किया है कि क्या प्रदर्शन के दौरान कोरोना नियमों (Coronavirus Guidelines) का पालन किया जा रहा है? इसके बाद केंद्र सरकार के वकील ने नहीं में जवाब दिया।  इस पर चीफ जस्टिस एस. ए. बोबड़े ने कहा कि अगर कोरोना नियमों का पालन नहीं किया गया तो नई दिल्ली में पिछले साल हुए तबलीगी जमात के तरह हालात हो सकते हैं। यह सरकार की जिम्मेजारी है कि वो गाइडलान्स का अनुपालन सुनिश्चित करवाए।

क्या है तबलीगी जमात का मामला?

बता दें कि पिछले साल जब देश में कोरोना वायरस (Coronavirus) के संक्रमण को रोकने के लिए लॉकडाउन लगाया गया था, उसी समय तबलीगी जमात का मामला सामने आया था। पिछले साल मार्च में नई दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज में सैकड़ों लोग शामिल हुए थे और फिर वह अलग-अलग राज्यों में गए थे। मरकज में शामिल कई लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए थे और कोरोना नियमों को तोड़ने का आरोप लगा था।

44 दिनों से चल रहा है किसानों का प्रदर्शन

कृषि कानूनों (Agriculture Laws) के खिलाफ किसानों का प्रदर्शन पिछले 42 दिनों से जारी है और इस दौरान सरकार के साथ किसानों की सात दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन पूरी तरह से सहमति नहीं बन पाई है. किसान संगठन कानूनों को पूरी तरह रद्द करने की मांग पर अड़े हैं, जबकि सरकार कानूनों की खामियों वाले बिंदुओं पर चर्चा करना चाह रही है। किसानों और सरकार के बीच अगले दौर की बातचीत 8 जनवरी को होगी। 4 जनवरी को हुई सातवें दौर की बातचीत में बिजली दरों में वृद्धि और पराली जलाने पर दंड को लेकर किसानों की चिंताओं को हल करने के लिए सहमति बनी थी, लेकिन दो बड़े मुद्दों पर गतिरोध बना रहा। किसानों की मांग है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए कानूनी गारंटी दी जाए और तीनों नए कृषि कानूनों को रद्द किया जाए। जबकि सरकार किसानों की सभी चिंताओं का समाधान तार्किक आधार पर करने को राजी है। अब देखना होगा कि सर्वोच्च अदालत की टिप्पणी के बाद सरकार क्या कदम उठाती है, और दोनो पक्षों में बातीचीत में कितनी रजामंदी बनती है।

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