नए कानूनों से किसान को कितना फायदा होगा इसे लेकर सरकार और बीजेपी ग्राफिकल प्रचार में लगे हैं।

भले ही किसानों का आंदोलन चरम पर हो और सरकार किसानों के साथ समझौते को लेकर अपना लिखित प्रस्ताव भेजकर यह भरोसा दिला चुकी है कि किसानों की चिंताओं के मुताबिक कानूनों में अपेक्षित संसोधन किए जाएंगे। लेकिन दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी और सरकार के मंत्रियों की ओर से जारी किए गए इन्फोग्राफिक्स बता रहे हैं कि कानूनों में कोई कमी है ही नहीं और इनसे किसानों की झोली भरने जा रही है।

यह सभी इन्फोग्राफिक्स कृषि मंत्रालय के हवाले से बनाए गए हैं, जिनमेंं दावा किया गया है कि नए कृषि कानून एमसपी को प्रभावित नहीं करते, लेकिन ना तो सरकार और ना ही भाजपा यह बताने की स्थिति में है कि आखिर इतने दशकों से अब तक किसानों की फसल खरीद करने के लिए जारी की जाती रही एमएसपी से अधिकतम 6 फसीदी ही खरीद क्यों  हुई और उसमें से भी सर्वाधिक खरीद पंजाब औऱ हरियाणा प्रदेशों से ही हुई है, बाकी देश से एमएसपी से खरीद बेहद कम क्यों की गई, क्यां तब कानून नहीं था।

इसी तरह दलील दी गई है कि एपीएमसी की मंडियां प्रभावित नहीं होेगी बल्कि इन्हें और व्यवस्थित किया जाएगा, और कारोबारियों के बराबर किसानों को भी मंडियों में खरीद फरोख्त का अधिकार हासिल होगा। अब सवाल है कि अब तक किसान को कोराबारी बनने से कौन रोक रहा था, लेकिन किसान के खेतों में नई फसल कटने तक ऐसी हालत ही नहीं होती कि वो और अधिक कर्ज का बोझ सह सके, उल्टे अधिकतर किसान कोराबारियों से नकदी लेकर ही खाद औऱ बीज की खरीद करते हैं, और उनकी रकम वापसी के लिए औने पौने दामों पर उन्ही को फसल बेचने को मजबूर रहते हैं, ऐसे में आखिर कैसे वो अपनी फसल को सुरक्षित रखकर भाव बढ़ने का इंतजार कर पाएंगे।

दलील दी गई है कि खरीददार को समय पर भुगतान करना होगा वरना कानूनी कार्यवाई का सामना करना होगा। जबकि हकीकत यह है कि सरकार जेम पोर्टल की व्यवस्था भी सुचारू ढंग से नहीं चला पा रही है, हजारों कारोबारियों का भुगतान सालों से अटका पढ़ा है, जबकि ऐसा करने वाली संस्थाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रवधान है, लेकिन किसी के भी खिलाफ कार्रवाई आज तक नहीं की गई, आखिर किसानों को सरकार की दलीलों पर भरोसा हो भी तो क्यों ?

सरकार कहती है कि किसान फसल उगाने से पहले ही अपने रेट तय कर लेगा, सवाल है कि जब कारोबारी एग्रीमेन्ट ही करने को तायर नहीं होगा तो किसान रेट तय करके करेगा क्या ? कारोबारी तो बाजार में सबसे कम कीतम पर ही बोली लगाते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि सरकार हर तरह की फसल के लिए न्यूनतम दर का निर्धारण करे। वरना किसानों के साथ उसी तरह का व्यवहार होने लगेगा, जैसे रियल स्टेट में बड़ी कंपनियां छोटी फर्मों के जरिए दबंगई से किसानों की जमीनें औने पौने दामों में खरीदवाती हैं, और फिर उन्हें डेवलपर बताकर पूरी जमीन अपने प्रोजक्ट के हिस्से कर लेती हैं, बड़े ही कानून तरीके से कानून को ठेंगा दिखाया जाता है। 

सरकार का औऱ भाजपा का दावा है कि नए कृषि सुधार कानूनों से देश में समृद्धि आएगी। मुमकिन है लेकिन पहली नजर में इन कानूनों से कॉरपोरेट और खाद्य प्रसंस्करण के काम करे साथ भंडारण करने वाले आढ़तियों की ज्यादा समृद्धि होती दिख रही है, जबकि किसान कागजी पेंचोखम के बीच बिचौलियों की शर्तों का शिकार अधिक होगा।  जैसे शहरों के विस्तार में किसानों की जमीनों का अधिग्रहण करते हुए किसानों के हित में कई तरह के नियम कायदे बनाए औऱ बताए गए थे, लेकिन कहीं भी किसानों के साथ न्याय नहीं हुआ, बड़ी तादाद में किसानों को अदालत की दहलीज पर गुहार लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा। सरकार को अपने ही आंकड़ों औऱ जमीनी हकीकत के साथ सच्चाई को जानना और समझना पड़ेगा।

एमसपी पर उपज बेंचने में किसान को आज भी नाकों चने चबाने पड़ते हैं, सरकार को दावा करने से पहले पूरे देश में क्रय केंद्रो की स्थिति में सुधार करके बिना किसी हील हुज्जत के एमएसपी पर धान और गेंहूं की खरीद तो करवा कर दिखाए। शायद ही कोई केन्द्र हो जहां किसान को एमएशपी पर बिना किसी शिकायत और संघर्ष के खरीद हो पाती हो। कई जगहों पर तो हालात इतने बदतर देखने को मिले हैं कि जिलाधिकारी और वरिष्ठ अधिकारियों तक आदेशों की खुलेआम अवहेलना होती देखी गई है।

सरकार और भाजपा का नए कृषि कानूनों के पास होने के बाद धान की रिकॉर्ड खरीद के आधार पर अफनी पीठ थपथपाई जा रही है, लेकिन आंकड़े खुद ही गवाही दे रहे हैं, कि एमएसपी तय होती है पूरे देश के लिए , लेकिन आधी से ज्यादा खरीद होती है केवल पंजाब में , बाकी का बड़ा हिस्सा हरियाणा में। 

किसानों से जुड़े अहम सवाल

  • आखिर बाकी देश के किसानों की फसल की खरीद  क्यों नहीं होती ? 
  • पूरे देश में किसानों की जरूरतों को हाशिए पर क्यों रखा गया ?
  • किसानों से अधिक कॉरपोरेट को कृषि के मामले में भी अहमियत क्यों दी जाती है ?
  • अगर सरकार किसान हितैषी है तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर लागत का सही आंकलन क्यों नहीं किया जाता ?
  • सरकार किसानों की मेहनत को इतना कम करके क्यों आंकती है ?

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