आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार समझौते के मूड में है। सरकार के साथ किसान संगठनों की 6 दौर की बातचीत हो चुकी है। पिछली बैठक में किसान संगठनों की लिखित चार मागों में से सरकार ने दो मांगें मान लीं थी, और दो पर 4 जनवरी को चर्चा की तारिख मुकर्रर की थी। अब 4 जनवरी को किसान संगठनों के साथ सरकार की अहम बैठक होनी है, परिणामों को लेकर उम्मीदें बंधी हुई हैं।

दिल्ली: भारत में कृषि और कृषि सुधारों को लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाओं का दौर जारी है। साथ ही मोदी सरकार के तीन कृषि सुधार कानूनों के विरोध में 40 दिन पहले शुरू हुए दिल्ली घेराव आंदोलन से दिल्ली और पड़ोसी राज्य प्रभावित हैं। सरकार किसान संगठनों के आंदोलन को खत्म करवाने के कई तरीके आजमा चुकी है, लेकिन बात नहीं बनी, जिसके बाद सरकार ने अपना रूख नरम करते हुए सकारात्मकता दिखाई, जिससे पिछली बैठक में दोनो पक्षों के बीच तल्खी घटी है। लेकिन 4 जनवरी की बैठक, आंदोलन की अहम मांगों को लेकर है, जिससे दोनो पक्षों ने थोड़ा थोड़ा कदम पीछे किए हैं, जहां सरकार सुधार को लेकर हर तरह की चर्चा की बात कर रही है, तो वहीं किसान संगठन इन कानूनों को किसानों के खिलाफ करार दे रहे हैं। 

4 जनवरी की बैठक आंदोलन का भविष्य तय करेगी, तो वहीं आंदोलन के बहाने कृषि का विषय जिस तरह से केंद्र में आया है, किसानों की आंकांक्षाओं को पूरा करने के साथ ही सभी आशंकाओं को जमीनी  तौर पर दूर करना सरकार के लिए सीधी बड़ी चुनौती है। प्रधानमंत्री के दावे को जमीनी तौर पर किसान हितकारी बनाने के लिए सरकारी मशीनरी, ब्यूरोक्रेसी को भी अन्नदाता की जमीनी परिस्थितियों से अच्छे ढंग से वाकिफ करवाना पड़ेगा।

तमाम कृषि नीतियों और समीतियों के बावजूद व्यापक रूप में किसान को हमेशा से नुकासन ही होता रहा है। यह बात भी सही है कि मोदी सरकार ने कई तरह की योजनाओं के जरिए किसानों को खासी मदद उपलब्ध करवाई है, लेकिन किसानों की आर्थिक और सामाजिक उन्नति के लिए सरकारी तंत्र से लेकर जमीनी इंफ्रास्टक्चर में भारी बदलाव की दरकार है। जिसमें सरकार के साथ ही प्राइवेट प्लेयर्स भी निवेश करना चाहते हैं, ऐसे में स्पष्ट नीतियों के साथ पुख्ता नीयत और वस्तुस्थिति की नियमित सीमाक्षा भी होनी ही चाहिए।

पूरी बहस किसानों की कई तरह की कैटेगरीज के इर्द गिर्द हितों के टकराव के रूप में देखी जा रही है, बड़े किसान कई राज्यों में सुधारों के समर्थन में हैं, तो वहीं पंजाब और हरियाणा के किसानों में खासी नाराजगी है। छोटे किसानों के हितों की रक्षा का ठोस आधार अभी तक कानूनों के जरिए किसी कार्ययोजना के रूप में सामने नहीं आया है, लेकिन सरकार की दलील ऐसे मार्जिनल  फार्मर्स के हितों की संपूर्ण सुरक्षा की है। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री, वित्तमंत्री सभी इसी तरह के संकल्प दोहरा चुक हैं, लेकिन इस संकल्प को विश्वास में बदलने के बाद ही अविश्वास के बादल छंट सकेंगे।

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