बेनतीजा कई दौर की बैठकों के बाद किसानों के आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार खुले मन से बात करने को तैयार हुई है, जिसकी वजह से किसान संगठनों ने भी अपनी बड़ी रैली को फिलहाल टाल दिया है। दोनो ही पक्ष समाधान के रास्ते पर हैं, माना जा रहा है कि 30 दिसम्बर का दिन बेहद अहम और निर्णायक होने वाला है।

नई दिल्ली : कृषि सुधार कानूनों की मुखालफत करने के लिए देश के 40 किसान संगठनों के नेतृत्व में हजारों किसानों ने करीब एक महीने से अधिक वक्त से दिल्ली को चारों तरफ से घेर रखा है। किसान तीनों कानूनों को वापस लेने की अपनी मांग पर अड़े थे, तो वहीं सरकार संसोधन से अधिक कुछ भी करने को तैयार नहीं थी। कई दौर की बातचीत बेनतीजा रहने औऱ आंदोलन के लंबा खिंचने की सूरत में दोनो ही पक्षों के बीच कुछ नरमी नजर आ रही है। चुंकी इस दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसानों से जमीनी वास्तविकताओं को समझते हुए अपनी मांगों पर पुनर्विचार करने की अपील की थी।

दोनो पक्षों के रूख में नरमी लेकिन दोनो ही पक्ष अपने स्टैंड पर कायम, आखिर कैसे निकलेगी राह ?

30 दिसंबर को बातचीत के लिए तैयार किसान संगठनों के रूख में नरमी तो दिख रही है, लेकिन वो अपनी मांगों से जरा भी टसमस होने का राजी नहीं हैं। कृषि सुधार कानूनों को रद करने की मांग के साथ ही एमएसपी की गारंटी, पराली जलाने पर जुर्माना न होने व बिजली अध्यादेश में बदलाव की मांगें भी शामिल है। कृषि सचिव के लिखित बुलावा पत्र के जरिए सरकार की ओर से वार्ता में हिस्सा लेने के लिए 40 संगठनों के नेताओं को बुलावा भेजा गया है। इसके पहले किसान मोर्चा ने अपने कुछ मुद्दों के साथ 29 दिसंबर को वार्ता में आने का प्रस्ताव भेजा था। लेकिन सरकार ने एक दिन बढ़ाते हुए बैठक की तिथि 30 दिसम्बर मुकर्रर की।

कृषि सचिव संजय अग्रवाल ने अपने पत्र में किसान संगठनों के उठाए गए मुद्दों पर विस्तृत चर्चा करने की बात कही है। अग्रवाल ने कहा है कि सरकार साफ नियत और खुले मन से प्रासंगिक मुद्दों के तर्कपूर्ण समाधान के लिए प्रतिबद्ध है। इससे सकारात्मक नतीजे पर पहुंचने की उम्मीद जगी है। राजधानी दिल्ली के विज्ञान भवन में वार्ता 30 दिसंबर को दोपहर दो बजे से शुरू होगी। इसके पहले आखिरी वार्ता पांच दिसंबर को यहीं हुई थी, जिसमें किसान संगठनों के अड़ियल रख के चलते वार्ता में गतिरोध पैदा हो गया था।

साफ नीयत और खुले मन के साथ बैठक में हिस्सा लेने की अपील 

किसान नेताओं से सरकार की ओर से खुले मन और साफ नीयत के साथ बातचीत में हिस्सा लेने की अपील की गई है। दरअसल अब तक हुई बैठकों में सरकार की ओऱ से कानूनों में संसोधन की बात ही की जाती रही, जबकि किसान संगठन तीनों कानूनों को रद्द करने से कम पर हरगिज तैयार नहीं थे, इसीलिए, संघटनो ंने यस और नो में सरकार से जवाब मांगा था। और सभी दौर की बातचीत बेनतीजा ही खत्म हो गई थीं, सरकार के जिम्मेदार मंत्रियों ने किसान आंदोलन को पटरी से उतारने के लिए कई तरह के आरोप प्रत्यारो और बयानबाजियों से किसान संगठन खासे नाराज हैं, तो वहीं किसानों के इतने बड़े आंदोलन में विपक्षी दल समर्थन के बहाने किसानों को अपने पाले में करने की हर ममुकिन कोशिश कर रहे  हैं।

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